Mirza Ghalib ki Behetarin Urdu Shayariyan

जब-जब शायरों का नाम लिया जाएगा तब तब एक नाम हमेशा लोगो के लफ्जो पर जरूर आयेगा और वो नाम है "मिर्ज़ा गालिब"। इस article मे आपको मिर्ज़ा गालिब की कुछ बहतरीन शायरियाँ पढ़ने को मिलेंगी जिनपर लाखो लोग फिदा हैं।

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मिर्ज़ा गालिब की तस्वीर



कौन थे मिर्ज़ा गालिब।

27 दिसंबर 1797 को जन्मे मिर्ज़ा गालिब जिनका असली नाम था मिर्ज़ा असदुल्लाह बैग खान। उनका जन्म आगरा के काला महल मे हुआ था। वे बहुत ही जाने माने उर्दू और Persian कवि थे। उनकी लिखी शायरियों मे बहुत गहरा मतलब छुपा होता है। वे ज़िंदगी, प्यार, दोस्ती जैसे अनेक चीजों पर शायरी लिखते थे। उनकी व्यक्तित्व जीवन की बात करें तो उनकी शादी 13 साल की उम्र मे उमराओ बेगम से हुई थी। उमराओ बेगम नवाब इल्लाही बक्ष की बेटी थी।

मिर्ज़ा गालिब का बचपन काफी कठिनाइयो से गुज़रा। बहुत छोटी उम्र मे उनके पिता मिर्ज़ा अब्दुल्लाह बैग का निधन हो गया था। उसके बाद वो अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ रहने लगे। उनका नाम था मिर्ज़ा नसरुल्लाह बैग खान। दुर्भाग्य से 3 साल बाद उनका भी निधन हो गया। उसके बाद वो 13 साल के उम्र मे शादी करके दिल्ली चले गए।

उनकी एक शायरी मे यह भी ज़िक्र किया है कि लोग कैसे उन कामो मे ज्यादा व्यस्त रहते हैं जो वो खुद करना नहीं चाहते बल्कि उनको हर वक़्त खुश और उत्सुकता से पूर्ण रहना चाहिए।

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
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मिर्ज़ा गालिब की बहतरीन शायरियाँ।

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बे वजह नहीं रोता इश्क़ मे कोई गालिब
जिसे खुद से बढ़कर चाहो वो रुलाता जरूर है।

Be wajah nahi rota ishq mein koi ghalib
Jise khud se badhkar chaho woh rulata zarur hai.


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बेवफा होता तो एक भीड़ होती मेरे साथ
वफादार हूँ इसलिए तन्हा हूँ।

Bewafa hota to ek bheed hoti mere sath
Vafadar hun isliye tanha hoon.


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पीने दे शराब मस्जिद मे बैठकर गालिब
या वो जगह बता जहां खुदा नही हैं।

Peene de sharab masjid mein baithkar
ghalib
Ya woh jagah bata jahan khuda nahi hai.


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हमको उनसे है वफा की उम्मीद
जो नहीं जानते वफा क्या है।

Humko hai unse wafa ki umeed
Jo nahi jante wafa kya hai.


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कुछ इस तरह से मैंने जिंदगी को आसान कर लिया गालिब
किसी से माफी मांग लिया तो किसी को माफ कर दिया।

Kuch iss tarah se maine zindagi ko aasaan kar liya
ghalib
Kisi se maafi maang liya to kisi ko maaf kar diya.


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दर्द ए नादान तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है।

Dard-e-naadaan tujhe hua kya hai
Aakhir iss dard ki dawa kya hai.


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उम्र भर गालिब यही गलती करते रहे
धूल चेहरे पर थी हम आईना साफ करते रहे।

Umr bhar
ghalib yahi galti karte rahe
Dhool chehre par thi hum aayina saaf karte rahe.



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ये चंद दिनो की दुनिया हैं गालिब
यहाँ पलकों पर बिठाया जाता है नज़रो से गिराने के लिए।

Yeh chand dino ki duniya hai
ghalib
Yahan palko par bithaya jaata hai nazaro se girane ke liye.


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रहने दो मुझे अंधेरों मे गालिब
कमबख्त रोशनी मे अपनो के चेहरे सामने आ जाते हैं।

Rehne do mujhe andhero mein
ghalib
Kambakht roshni mein apno ke chehre samne aa jate hain.


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फकत बाल रंगने से कुछ नहीं होता गालिब
कुछ नादानियाँ भी किया करो जवान रहने के लिए।

Fakat baal rangne se kuch nahi hota
ghalib
Kuch nadaniyan bhi kiya karo jawan rehne ke liye.


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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है
ये वो आतिश गालिब
कि लगाए न लगे
और बुझाये न बुझे।

Ishq par zor nahi hai
ye woh aatish
ghalib
Ki lagaye na lage
aur bujhaye na bujhe.


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ऐज़ाज तेरे इश्क़ का ये नहीं तो और क्या है
उड़ने को ख्वाब देख लिया इक टूटे हुए पर से।

Ajaz tere ishq ka ye nahi to aur kya hai
Udhne ko khwab dekh liya ik tute huye par se.


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मैं नादान था जो वफा को
तलाश करता रहा गालिब
यह न सोचा कि अपनी सांस भी
एक दिन बेवफा हो जाएगी।

Main naadaan tha jo wafa ko talaash karta raha
ghalib
Yah na socha ki apni saans bhi ek din bewafa ho jayegi.


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किसी ने हम से पूछा कैसे हो तुम
हमने हँसकर कहा
जिंदगी में गम है
गम में दर्द है
दर्द में मज़ा है
और मज़े मे है हम।

Kisi ne hum se pucha kaise ho tum
Humne hanskar kaha
Zindagli mein gum hai
Gum mein dard hai
Dard mein maza hai
Aur maze mein hain hum.


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हम तो फना हो गए उनकी आंखे देखकर गालिब
न जाने वो आईना कैसे देखते होंगे।

Hum to fana hogye unki aankhe dekhkar
ghalib
Na jaane woh aayina kaise dekhte honge.


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इश्क़ ने गालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी थे आदमी काम के।

Ishq ne
ghalib nikamma kar diya
Warna hum bhi the aadmi kaam ke.


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रहने दो अब तुम मुझे पढ़ न सकोगे
बरसात मे कागज़ की तरह भीग गया हूँ मैं।

Rehne do ab tum mujhe padh na sakoge
Barsaat mein kaagaz ki tarah bheeg gaya hoon main.


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गुनाह करके कहाँ जाओगे गालिब
ये ज़मीन और आसमान सब उसी का हैं।

Gunah karke kahan jaoge ghalib
Yeh zameen aur aasman sab usi ka hai.


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हाथों की लकीरों पर मत जा गालिब
नसीब उनके भी होते हैं
जिनके हाथ नहीं होते।

Haathon ki lakiro par mat ja ghalib
Naseeb unke bhi hote hain
jinke haath nahi hote.



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जो उनके देखने से आ जाती है चेहरे पे रौनक
वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है।

Jo unke dekhne se aa jati hai chehre pe raunak
Woh samajhte hain bimaar ka haal accha hai.


दोस्तो थे मिर्ज़ा गालिब के कुछ बहतरीन शायरियाँ। उम्मीद करता हु आपको यह article जरूर पीएसएनडी आया होगा। इस article को अपने दोस्तो के साथ जरूर share करें।

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